कालिदास की रचनाओं में प्रकृति चित्रण। कालिदास की कृतियों में प्रकृति चित्रण।kalidas ke kavy me prakriti chitran

कालिदास की रचनाओं में प्रकृति चित्रण। कालिदास की कृतियों में प्रकृति चित्रण।kalidas ke kavy me prakriti chitran

 कालिदास की रचनाओं में प्रकृति चित्रण। कालिदास की कृतियों में प्रकृति चित्रण।

कालिदास की रचनाओं में प्रकृति चित्रण। कालिदास की कृतियों में प्रकृति चित्रण।kalidas ke kavy me prakriti chitran


कालिदास मुख्यत प्रकृति प्रेम के प्रमुख कवि माने जाते हैं। कालिदास प्रकृति की गोद में ही पले बढे है।। इसी कारण जब हम उनकी कृतियों को देखते हैं तो पाते हैं कि उनके कृति पात्र भी प्रकृति में ही अपना जीवन जीते हैं। यह सर्वथा स्वाभाविक और सत्य है कि मानव जीवन और प्रकृति का मनुष्य के जन्म से ही एक अटूट संबंध होता है। प्रकृति के बिना मानव जीवन मृत है। कालिदास भी प्रकृति से जुड़े ही मनुष्य थे। इसी कारण उनकी कृतियों में भी हमें प्रकृति चित्रण देखने को मिलता है।।


1. कालिदास के काव्य में प्रकृति चित्रण

कालिदास की प्रथम रचना कृति ऋतुसंहार को माना जाता है। कभी वे नवयुग में प्रकृति का चित्रण करते हैं तो कभी सौंदर्य रूप पर हाव-भाव में प्रकृति को चित्रित करते हैं।। मेघदूत में प्रकृति और मानव जीवन में एकता स्थापित करने का प्रयास किया गया है। कुमारसंभवम् में उन्होंने हिमालय की अभूतपूर्व सुंदरता का चित्रण करते हुए शिव और पार्वती का प्राकृतिक वर्णन किया है। रघुवंशम में कवि ने मानव जीवन और प्रकृति को एक सूत्र में भी पिरोया है। अभिज्ञान शाकुंतलम् me उन्होंने मानव जीवन और प्रकृति के मधुर संबंधों को हमारे सामने रखा है।


2. आलंबन के रूप में प्रकृति का चित्रण

प्रकृति का सहज एवं में स्वाभाविक यथार्थ चित्रण ही आलंबन रूप है। हम पाते हैं कि संस्कृत के लगभग सभी कवियों ने आलंबन रूप में अपने काव्यों को लिखा है। कालिदास की कृतियों में भी हमें इस प्रकार का चित्रण देखने को मिलता है। हम देखते हैं कि वे यथार्थ चित्रण से प्रकृति को एक स्वाभाविक रूप प्रदान करते हैं। उनकी अधिकांश लक्षणों में हमें प्रकृति का आलंबन रूप ही देखने को मिलता है।।


3. मानवीकरण के रूप में प्रकृति चित्रण

कालिदास की रचनाओं में हम देखते हैं कि मानवीय भावना भी सुख और दुख का अनुभव करती हैं। अभिज्ञान शाकुंतलम् में हम देखते हैं कि जब शकुंतला कण्व ऋषि के आश्रम से अपनी विदाई लेती है तो मानो संपूर्ण प्रकृति ही सजीव हो उठती हैं। हिरण का बच्चा शकुंतला को जाने से रोकता। शकुंतला जब जाने की आज्ञा मांगती है तो कोयल कूकती है, मानो उन्होंने स्वीकृति दे दी हो। माधुरी लता को शकुंतला की बहन बताया गया है शकुंतला जाते-जाते माधुरी लता को गले लगाती है। वही रघुवंशम है हम देखते हैं कि जब राजा दिलीप नंदिनी गाय की सेवा के लिए जाते हैं तो मानो वृक्ष राजा की जय करते हैं। हवा मानों बांसुरी बजाती है।

मेघदूतम में हम पाते हैं कि मैं मेघ को एक सजीव प्राणी के रूप में मानवीकृत किया गया है।। मेघ को एक दूध के रूप में यक्ष अपनी प्रेमिका के पास भेजता है। इस प्रकार कालिदास ने प्रकृति का मानवीकरण एक अद्भुत रूप में किया है।


4. संवेदना के रूप में प्रकृति चित्रण

कभी-कभी हम देखते हैं कि प्रकृति भी संवेदनात्मक हो जाती है। प्रकृति की मानव की भांति सुख दुख व्यक्त करती है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हमें अभिज्ञान शकुंतलम में देखने को मिलता है। जब शकुंतला की विदाई होती है तो हम देखते हैं कि लताएं, वृक्ष, पादप सब उदास हैं, वे शकुंतला के विदेश से दुखी हैं वे नहीं चाहते कि शकुंतला जाए।


5. उपमान के रूप में प्रकृति का चित्रण

हम देखते हैं कि जब भी कोई कवि किसी प्रकार का चित्रण करना चाहता है तो वह उपमा के लिए प्रकृति को ही प्रस्तुत करता है, ताकि व्यक्ती या अवस्था या वस्तु विषय को आसानी से समझा जा सके। कालिदास तो वैसे भी उपमा के लिए प्रसिद्ध है। शकुंतला नाटक में हम देखते हैं कि शकुंतला के होठों के लिए पल्लव की लालिमा तथा कुमारसंभवम् में पार्वती की मुस्कान की सुंदरता प्रकृति में ही कवि को दिखाई देती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कालिदास प्रकृति के कितने प्रेमी थे। उनकी उपमा और प्रकृति के लगाओ ने उनके काव्य को एक अलग ही रूप प्रदान किया।


6. उद्दीपन के रूप में प्रकृति का चित्रण

हम देखते हैं कि जैसे-जैसे ऋतुएं बदलती है,, हम देखते हैं कि नवयुवक और नवीन युवतियों के मन भी उसी प्रकार बदल जाते हैं। ऋतुसंहार में छह ऋतु का वर्णन हमें उद्दीपन के रूप में ही देखने को मिलता है। हम देखते हैं कि प्रत्येक ऋतु अपनी सुंदरता से प्रेमियों के हृदय को प्रेम के लिए उद्दीप्त करती है।


हम कह सकते हैं कि कालिदास प्रकृति के पुजारी थे। अपने कार्यों में प्रकृति को हमेशा से ही स्थान दिया है। उन्होंने लगभग अपनी सभी रचनाओं में प्रकृति के सौंदर्य सिंगार रूप को उभारा है। जिस प्रकार से उन्होंने प्रकृति के सौंदर्य रूप को अपने काव्यों में स्थान दिया है, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद हुए प्रकृति के भीषण हुए भयावह रूप से अनजान थे। लेकिन फिर भी उनके प्रकृति प्रेम से हम पाते हैं कि उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रकृति व मानव जीवन को लगभग एक समान ही कर दिया था।

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