रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जीवन परिचय। ramvriksh benipuri ka jivan Parichay hindi

रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जीवन परिचय। ramvriksh benipuri ka jivan Parichay hindi

 रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जीवन परिचय।  ramvriksh benipuri ka jivan Parichay 

रामवृक्ष बेनीपुरी जी का जीवन परिचय। ramvriksh benipuri ka jivan Parichay

हिन्दी के निबंधकारों में रामवृक्ष बेनीपुरी का नाम है। उनका जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जनपद में स्थित गंगापुर गाँव में सन् 1859 हुआ। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया। उस मुसीबत और कष्टों को सहकर उन्होंने दसवीं कक्षा उतीर्ण की। सन् 1920 में से गाँधी जी के आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में खुलकर भाग लिया फलस्वरूप उनको अनेक बार रेल यात्रा भी करनी पड़ा। उन्होंने पत्रकारिता तथा साहित्य लेखन को ही अपनी आजीविका का माध्यम बनाया। सन् 1965 में इस महान निबंधकार का देहान्त हो गया


रचनाएँ-

 राम बेनीपुरी ने लगभग सभी विधाओं में रचनाएँ लिखो। (क) रेखाचित्र और अंसस्मरण- माटी की मूरतें' जंजीर और दीवारें (संस्मरण) (ख) उपन्यास 'पतितों के देश में


(ग) निबंध-गेहूँ और गुलाब


(घ) यात्रा-वृतान्त- पैरों में पंख भास्कर' (ड) कहानी- चिता के फूल'


(च) नाटक-नेत्रदान' 'अम्बपाली' आदि।


साहित्यिक विशेषताएँ 

निबंधकार के रूप में बेनीपुरी जी को विशेष ख्याति मिली। उनके निबंधों में विचार, कल्पना तथा भावना का संगम देखा जा सकता है। उनके विचार पूर्णतया स्पाट हैं। वे विभिन्न प्रकार के उद्धरणों तथा भावुक प्रसंगों के माध्यम से पाठक के हृदय तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयास करते हैं। राष्ट्रीय चेतना, सामाजिकता तथा जनकल्याण उनके निबंधों की प्रमुख विशेषताएँ हैं। वे अपने पाठकों को त्याग, बलिदान तथा कार्य करने की शिक्षा देते हैं। उन्होंने प्रायः विचारात्मक भावात्मक तथा वर्णनात्मक निबंध लिखे हैं। रामवृक्ष बेनीपुरी जब विचारों, तर्कों तथा स्थापनाओं के जगत में उतरना चाहते हैं तो वे प्रायः भावुक हो जाते हैं। ऐसे स्थलों पर उनका चिंतन बड़ा गम्भीर हो जाता है। लेखक ने अपने रेखाचित्रों में प्रतिदिन के सामाजिक जीवन तथा सामान्य व्यक्तियों का सहज, सरल परन्तु सरस वर्णन किया है।

भाषा-शैली-

भाषा पर बेनीपुरी जी का असाधारण अधिकार है। उन्होंने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिन्दी भाषा का भी प्रयोग किया है। उनको भाषा में संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का मिश्रण देखा जा सकता है। वे छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करते हुए अपने विचारों को आगे बढ़ाते हैं। परन्तु उनकी भाषा पूर्णतः प्रवाहमयी है। उनकी वाक्य रचना भी सरल है तथा शब्द योजना सहज है। रामवृक्ष बेनीपुरी ने प्रायः अंलकृत भाषा का प्रयोग किया है। उनकी शैली भावुकता प्रधान है। इस प्रकार की भाषा शैली संस्मरणों तथा रेखाचित्रों के लिए सर्वथा उचित होती है। माटी की मूर नामक रचना इसलिए काफी लोकप्रिय हुई है।।


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