आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध। Essay  on modern education system।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध। Essay on modern education system।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली। भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबन्ध।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली। भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबन्ध


भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरूआत का श्रेय अंग्रेजों को जाता है। इसकी शुरुआत क्यों और कैसे हुई, यह जानने के लिए हमें भारत में शिक्षा की प्राचीन काल से लेकर अब तक की स्थिति का आकलन करना होगा भारत में शिक्षा की शुरूआत वैदिक काल से मानी जाती है। वैदिक काल में शिक्षा के लिए गुरुकुल व्यवस्था थी। बालक संसार के प्रलोभनों से दूर, आमोद-प्रमोद से विरका मुद्धतापूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए गुरु की छत्रछाया में शिक्षा की समाि तक रहता था। बौद्ध धर्म के आविर्भाव के साथ ही वैदिक काल का अन्त एवं बौद्धकाल का प्रारम्भ हुआ यहाँ गुरु-शिष्य परम्परा की अनूठी मिसाल देखने को मिली। शिक्षा के प्रति सब समर्पित रहते थे। किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी के बाद मुस्लिम शासकों के आक्रमणों एवं उनके वर्चस्व स्थापित होने के फलस्वरूप पूरे देश में प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का हास होने लगा एवं मुस्लिम शिक्षा व्यवस्था का बोलबाला हो गया। मुगल शासकों ने अपने धर्म एवं संस्कृति के प्रचार के

उद्देश्य से शिक्षा में धर्म के वर्षस्व को बढ़ावा दिया, जिससे समाज में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिला। इस काल में शिक्षा के केन्द्र के रूप में काफी संख्या में मकतवों एवं मदरसों की स्थापना की गई। भुगलों के पतन के बाद भारत में ब्रिटिश शासकों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया और इसी के साथ यहाँ यूरोपीय शिक्षा व्यवस्था आत आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का शुरुआत हुई। वैसे तो अंग्रेजों शासक के रूप में भारत में शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी को समझते हुए सन् 1781 में मुस्लिमों की उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता में मदरसा एवं सन् 1791 में बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की, किन्तु यूरोपीय शिक्षा व्यवस्था प्रारम्भ करने के प्रयास ब्रिटिश संसद के सन् 1813 में पारित चार्टर (आज्ञापत्र) के बाद ही प्रारम्भ हुए। इसके बाद सन् 1835 में लॉर्ड मैकाले के विवरण-पत्र को स्वीकृति मिलने के साथ ही भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नींव पड़ी।


इसके बाद मैकाले के के आधार पर भारत में शिक्षा के विकास के प्रयास प्रारम्भ हो गए। शिक्षा के इस विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से चार्ल्स वुड की अध्यक्षता में बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल की स्थापना की गई। वुड ने 1854 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसे वुड्स डिस्पैच (बुद्ध का घोषणा पत्र की संज्ञा दी जाती है। इस घोषणा पत्र में उसने लन्दन विश्वविद्यालय को आदर्श मानते हुए उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता), बम्बई (वर्तमान मुम्बई) एवं मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में विश्वविद्यालयों की स्थापना करने का सुझाव दिया। इस तरह वुड्स डिमैच के फलस्वरूप भारत में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की नींव मजबूत हुई और 1857 ई. में मद्रास, बम्बई एवं कलकत्ता में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।


15 अगस्त, 1947 यानी देश को आजादी मिलने के बाद शिक्षा सम्बन्धी सुधारों के दृष्टिकोण से समय-समय पर कई शिक्षा आयोगों की नियुक्ति की गई एवं उनके सुझावों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं परिवर्तन किए गए। इनमें विश्वविद्यालय आयोग (1948-49 ई. में), माध्यमिक शिक्षा आयोग (1962-53 ई. में) एवं भारतीय शिक्षा आयोग (1964-66 ई. में) प्रमुख हैं। भारतीय शिक्षा आयोग की संस्तुतियों के कार्यान्वयन के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रस्ताव 1986 ई. में पारित किया गया, 10 2 3 शैक्षिक ढाँचे की शुरुआत हुई कार्यानुभव को स्कूल के पाठ्यक्रम में विशेष स्थान मिला, अध्यापकों के वेतनमान तथा सेवा-शर्तों में सुधार हुआ एवं शिक्षा के व्यवसायीकरण को बल मिला। इसके बाद शिक्षा समानता अर्थात् किसी जाति, धर्म, वर्ग अथवा लिंग के आधार पर भेदभाव न करने की व्यवस्था की बात की गई


वास्तव में व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा आधुनिक शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषता है। प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता को देखते हुए शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग वाले बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है। किन्तु भारत की जनसंख्या जिन तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि शिक्षा की समुचित व्यवस्था केवल सरकार द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। इसी को ध्यान में रखते हुए शिक्षा निजीकरण के प्रयास शुरू हुए।


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शिक्षा के निजीकरण का अर्थ है शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के अतिरिक्त गैर-सरकारी भागीदारी वैसे तो ब्रिटिश काल से ही निजी संस्थाएँ शिक्षण कार्य मे संलग्न थी, किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुदान एवं सरकारी सहायता के फलस्वरूप भारत में निजी शिक्षण संस्थाओं को बाढ़-सी आ गई है। स्थिति अब ऐसी हो चुकी है कि इस पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, क्योंकि अधिकतर निजी शिक्षण संस्थाएँ धन जमाने का केन्द्र बनती जा रही हैं एवं इनके द्वारा छात्रों एवं अभिभावकों का शोषण हो रहा है। शिक्षा के निजीकरण के यदि कुछ गलत परिणाम सामने आए हैं. तो इससे लाभ भी निश्चित तौर पर हुआ है। इसके कारण शिक्षा के प्रसार में तेजी आई है। शिक्षित लोगों को इसके जरिए रोजगार के साधन उपलब्ध हुए है एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।


चूँकि समाज एवं देश में समय के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं, इसलिए शिक्षा के उद्देश्यों पर भी समय के अनुसार परिवर्तन होते हैं। उदाहरण के लिए वैदिक काल में वेदमन्त्रों की शिक्षा को ही पर्याप्त मान लिया जाता था, किन्तु वर्तमान काल में मनुष्य के विकास के लिए व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जाता है। वर्तमान समय में कम्प्यूटर की शिक्षा के बिना मनुष्य को लगभग अशिक्षित ही माना जाता है, क्योंकि दैनिक जीवन में अब कम्प्यूटर का प्रयोग बढ़ा है। इस समय शिक्षा द्वारा उत्पादकता बढ़ाने, सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकीकरण करने, भारत का आधुनिकीकरण करने तथा सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करने के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में पारम्परिक एवं सैद्धान्तिक पाठ्यक्रम की अधिकता है। इसके स्थान पर आधुनिक एवं प्रायोगिक पाठ्यक्रम को समुचित स्थान दिया जाना चाहिए। साथ ही इसे अधिक रोजगारोन्मुखी बनाए जाने की भी जरूरत है। 


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